Labels: दुष्यंत कुमार

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दुष्यंत कुमार-आज वीरान अपना घर देखा

दुष्यंत कुमार-आज वीरान अपना घर देखा   आज वीरान अपना घर देखा  तो कई बार झाँक कर देखा  पाँव…
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दुष्यंत कुमार-होने लगी है जिस्म में जुम्बिश तो देखिए

दुष्यंत कुमार-होने लगी है जिस्म में जुम्बिश तो देखिए  होने लगी है जिस्म में जुम्बिश तो दे…
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दुष्यंत कुमार-एक गुड़िया की कई कठ-पुतलियों में जान है

दुष्यंत कुमार एक गुड़िया की कई कठ-पुतलियों में जान है । एक गुड़िया की कई कठ-पुतलियों में…
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दुष्यंत कुमार-गांधीजी के जन्मदिन पर

दुष्यंत कुमार-  गांधीजी के जन्मदिन पर मैं फिर जनम लूँगा  फिर मैं  इसी जगह आऊँगा  उचटती नि…
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दुष्यन्त कुमार हो गई है पीर पर्वत सी पिघलनी चाहिए

हो गई है पीर पर्वत सी पिघलनी चाहिए हो गई है पीर पर्वत सी पिघलनी चाहिए  इस हिमालय से कोई…
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दुष्यंत कुमार- ये ज़बाँ हम से सी नहीं जाती

दुष्यंत कुमार (ये ज़बाँ हम से सी नहीं जाती)   ये ज़बाँ हम से सी नहीं जाती  ये ज़बाँ हम से…
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Dusyant Kumar ( मैं जिसे ओढ़ता बिछाता हूँ )

दुष्यंत कुमार की कविता ( मैं जिसे ओढ़ता बिछाता हूँ ) मैं जिसे ओढ़ता बिछाता हूँ  मैं जिसे…

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